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माँ होने की तय परिभाषा से बाहर भी एक दुनिया है

माँ बनने को अक्सर जीवन का स्वाभाविक अगला कदम बताया जाता है। जैसे हर स्त्री के भीतर यह इच्छा पहले से मौजूद हो, और जैसे बच्चे का जन्म होते ही मातृत्व अपने आप पूरा हो जाए। लेकिन सच इससे कहीं अधिक उलझा हुआ है। कोई बच्चा चाहकर भी माँ नहीं बनना चाहता, कोई माँ बनने का रास्ता अलग चुनता है, और कोई व्यक्ति जन्म देने के बजाय देखभाल के जरिए माता-पिता की भूमिका निभाता है। इन अनुभवों को जगह देना ही मातृत्व पर गंभीर बातचीत की शुरुआत है।

इसी जरूरी सवाल को कैफ़े डिसेंसस के उनहत्तरवें अंक ने केंद्र में रखा है, जिसका विषय है मातृत्व की दूसरी कल्पनाएँ। यह केवल माँ बनने के सुख या त्याग का उत्सव नहीं है। अंक यह पूछता है कि माँ किसे कहा जाए, मातृत्व का अधिकार और जिम्मेदारी किसके पास हो, और क्या बच्चे से संबंध का मूल्य सिर्फ जैविक जुड़ाव से तय होना चाहिए। अलग-अलग लेख, कविता और कथा-विमर्श मिलकर उस एकरंगी तस्वीर को चुनौती देते हैं जिसमें माँ को हमेशा सहज, निस्वार्थ और प्रसन्न दिखाया जाता है।

माँ की पहचान जन्म से तय नहीं होती

अंक की संपादकीय टिप्पणी में पारोमिता सेनगुप्ता मातृत्व की परिभाषा को लेकर असुविधाजनक, पर जरूरी प्रश्न उठाती हैं। जब दुनिया में लाखों बच्चों को परिवारों की जरूरत है, तब क्या किसी भी कीमत पर प्रयोगशाला में अपनी पसंद के गुणों वाला बच्चा बनाना अधिक जरूरी है? यह सवाल विज्ञान का विरोध नहीं करता। यह पूछता है कि प्रजनन की तकनीकी क्षमता को हम किस तरह के सामाजिक मूल्यों के साथ इस्तेमाल कर रहे हैं। क्या बच्चे को चाहने का अर्थ हमेशा अपने ही आनुवंशिक गुणों की प्रतिलिपि चाहना है?

यहाँ गोद लेने का सवाल भी केवल किसी बच्चे को घर देने का मामला नहीं रह जाता। वह परिवार, अपनापन और जिम्मेदारी की हमारी धारणाओं को परखता है। यदि बच्चे को प्यार, सुरक्षा और स्थिर देखभाल मिल रही है, तो क्या जन्म देने वाला व्यक्ति ही उसकी माँ कहलाने का एकमात्र हकदार है? और यदि मातृत्व में मेहनत, साथ और रोजमर्रा की देखभाल शामिल है, तो इन कामों को सिर्फ स्त्री के हिस्से में क्यों रखा जाए? ऐसे प्रश्न आसान उत्तर नहीं देते, लेकिन पुराने जवाबों की सीमाएँ साफ कर देते हैं।

कमला भसीन का लेख अपने जीवन के एक शांत, निजी अनुभव से इस चर्चा को आगे बढ़ाता है। वह बताती हैं कि वह और उनका साथी छह साल से अधिक समय से एक-दूसरे को जानते थे, फिर भी उन्होंने बच्चा करने की बात तक नहीं की थी। दोनों में माता-पिता बनने की तीव्र इच्छा नहीं थी। कभी बच्चों को देखकर यह जरूर लगता कि अपना बच्चा होना अच्छा हो सकता है, मगर वह भावना इतनी मजबूत नहीं थी कि उनके काम और संतुष्ट जीवन पर भारी पड़ती। इस अनुभव में न कोई नाटकीय फैसला है, न किसी को मनाने की कोशिश। इसकी अहमियत इसी में है कि यह संतान न चाहने या उस इच्छा को लेकर अनिश्चित रहने को भी एक वैध जीवन-अनुभव मानता है।

मातृत्व पर बातचीत में ऐसी आवाजें अक्सर गायब रहती हैं। उनसे पूछा जाता है कि वे कब माँ बनेंगी, पर यह कम पूछा जाता है कि क्या वे सचमुच ऐसा चाहती हैं। इच्छा को सामाजिक अपेक्षा से अलग समझना जरूरी है। किसी स्त्री का निर्णय बच्चा न करना हो, देर से करना हो या माता-पिता बनने का कोई दूसरा रास्ता चुनना हो—उसकी पसंद को अधूरा जीवन कह देना उचित नहीं।

कैफ़े डिसेंसस का यह अंक इन प्रश्नों को एक ही उत्तर में बंद नहीं करता। cafedissensus की खासियत भी यही है कि यहाँ मातृत्व को निजी अनुभव, साहित्यिक कल्पना और सामाजिक बहस—तीनों के बीच रखकर देखा गया है। इस तरह पाठक को तैयार निष्कर्ष देने के बजाय सोचने के लिए अलग-अलग अनुभव मिलते हैं।

देखभाल, शरीर और रिश्तों की असली कीमत

अनुराधा मजूमदार का लेख माँ की पहचान को केवल संज्ञा की तरह देखने के बजाय उसे एक क्रिया की तरह समझने का आग्रह करता है। यह फर्क छोटा सुनाई देता है, मगर असर बड़ा है। यदि माँ होना सिर्फ जन्म से मिली स्थायी पहचान है, तो पिता, दत्तक अभिभावक या कोई और देखभाल करने वाला व्यक्ति इस शब्द से बाहर रह सकता है। लेकिन यदि मातृत्व देखभाल करने, साथ देने और जिम्मेदारी उठाने का काम भी है, तो उसका अर्थ अधिक खुलता है। लेख में आदित्य की कहानी का उल्लेख इसी दिशा में सोचने का अवसर देता है। राष्ट्रीय समाचार माध्यमों में चर्चा में आई इस कहानी से माँ की भूमिका को लिंग की तय सीमा से परे देखने का संकेत मिलता है।

माँ होने की चर्चा में शरीर को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पृथ्वीजीत सिन्हा का लेख बताता है कि मातृत्व कभी-कभी पवित्र त्याग की छवि के पीछे छिपा हुआ जाल भी बन सकता है। प्रसव के समय स्त्रियों की मृत्यु, बच्चे की परवरिश के बाद स्त्री की भूमिका का सीमित हो जाना और अपने शरीर पर नियंत्रण की कमी—ये सब केवल व्यक्तिगत कठिनाइयाँ नहीं हैं। इनके पीछे सामाजिक ढाँचे और असमान जिम्मेदारियाँ हैं। माँ की प्रशंसा करना आसान है; यह पूछना कठिन कि उसे स्वास्थ्य सेवा, निर्णय की स्वतंत्रता और देखभाल में बराबर साझेदारी क्यों नहीं मिलती।

यही कारण है कि मातृत्व को केवल भावनात्मक लगाव के रूप में पेश करना अधूरा है। प्यार महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे प्रसव का जोखिम, आर्थिक दबाव या लगातार बिना मान्यता के किया जाने वाला श्रम मिट नहीं जाता। किसी माँ को आदर्श बताने से पहले यह देखना चाहिए कि उसके पास फैसले लेने की कितनी स्वतंत्रता है और परिवार में काम का बँटवारा कैसा है। जब समाज मातृत्व की प्रशंसा तो करता है, पर उसकी व्यावहारिक जिम्मेदारियों को साझा नहीं करता, तब प्रशंसा भी एक तरह का दबाव बन सकती है।

बरशा मंडल का डिज़्नी की कहानी ‘टैंगल्ड’ पर लेख इस बात को काल्पनिक रिश्ते के जरिए दिखाता है कि हर माँ-बेटी का संबंध प्रेमपूर्ण नहीं होता। गोथेल और रैपन्ज़ेल के बीच संभावित स्नेह का रिश्ता अपहरण और नियंत्रण के कारण पहले ही टूट चुका है। ऐसे में रैपन्ज़ेल का यह पूछना कि क्या उसे गोथेल को माँ कहना भी चाहिए, कहानी का अहम क्षण बनता है। जन्म या पालन का दावा अपने आप किसी रिश्ते को सुरक्षित और प्रेमपूर्ण नहीं बना देता। देखभाल के नाम पर नियंत्रण हो, तो मातृत्व की भाषा भी चोट पहुँचा सकती है।

कहानियाँ जहाँ तय जवाबों को बदलती हैं

श्रेया मुखर्जी, चिमामांडा न्गोज़ी अदीची की २०२० में प्रकाशित लघुकथा ‘ज़िकोरा’ के माध्यम से आज के मातृत्व की जटिलताओं पर विचार करती हैं। स्त्रियों ने जीवन के अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं, फिर भी मातृत्व का प्रश्न उनके सामने आसान नहीं हुआ। निजी आकांक्षाएँ, शरीर, परिवार की अपेक्षाएँ और जिम्मेदारियों का बोझ अक्सर एक साथ सामने आते हैं। ‘ज़िकोरा’ की चर्चा इस अनुभव को किसी एक आदर्श माँ की कहानी बनाने के बजाय उसकी पेचीदगियों के साथ देखती है।

चंद्रकला घोष का लेख माँ-बेटी के पारंपरिक संबंध को मनोविश्लेषक कार्ल युंग की आदिरूपों से समझने की कोशिश करता है। यहाँ मातृत्व केवल स्नेह और सुरक्षा का नाम नहीं, बल्कि शोक, अलगाव और पहचान से भी जुड़ा है। बच्चा जब माँ के शरीर से अलग होता है, तो संबंध समाप्त नहीं होता; उसका रूप बदलता है। इसी तरह माँ-बेटी के रिश्ते में प्रेम के साथ तनाव, विरासत और अपनी अलग पहचान बनाने की इच्छा भी मौजूद हो सकती है। ऐसी परतों को स्वीकार करने से रिश्ते को दोष या आदर्श की दो ही श्रेणियों में बाँटने की जरूरत नहीं रहती।

अंक में पॉलामी सेनगुप्ता की कविताएँ भी हैं। उनकी कविता में मेट्रो और लिफ्ट जैसी रोजमर्रा की जगहें स्त्री के शरीर और सार्वजनिक जीवन के अनुभव से जुड़ती हैं। कविता का संक्षिप्त दृश्य यह याद दिलाता है कि स्त्री होना और अपने शरीर के साथ सार्वजनिक जगह में मौजूद रहना भी सामाजिक निगाहों से प्रभावित होता है। मातृत्व की बहस को इस बड़े संदर्भ से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि शरीर पर नियंत्रण, स्त्री की स्वतंत्रता और परिवार की अपेक्षाएँ एक-दूसरे से जुड़ी हैं।

कैफ़े डिसेंसस की संपादकीय बनावट इस विषय को कई विधाओं में खोलती है। संपादकीय विचार रखता है, व्यक्तिगत संस्मरण निर्णय और इच्छा की बारीकियाँ दिखाता है, जबकि कविता और साहित्यिक विश्लेषण उन भावनाओं तथा सत्ता-संबंधों को सामने लाते हैं जिन्हें सीधे बयान करना कठिन हो सकता है। योगदानकर्ताओं की अलग-अलग दृष्टियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि मातृत्व पर चर्चा केवल विशेषज्ञों या माता-पिता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जो लोग बच्चे नहीं चाहते, जो गोद लेने पर विचार करते हैं, जो पालन-पोषण करते हैं और जो अपने परिवार के रिश्तों को नए सिरे से समझ रहे हैं—सभी के अनुभव इस बातचीत का हिस्सा हैं।

इस अंक से निकलने वाली बात सीधी है, पर उसे अपनाना आसान नहीं: माँ होने की एक ही अनिवार्य परिभाषा नहीं हो सकती। जन्म, लगाव और देखभाल के रिश्ते अलग-अलग लोगों के जीवन में अलग रूप लेते हैं। बेहतर समाज वह नहीं जो हर व्यक्ति को एक ही रास्ते पर चलाए, बल्कि वह है जो बच्चों को सुरक्षित परिवार दे, स्त्रियों को अपने शरीर और फैसलों पर अधिकार दे, और देखभाल के श्रम को साझा जिम्मेदारी माने। मातृत्व को नए ढंग से देखना आखिरकार परिवार और बराबरी को नए ढंग से देखने की शुरुआत है।